सीतापुर:उत्तर प्रदेश के सीतापुर में एक ऐतिहासिक औद्योगिक इकाई की जमीन को लेकर चला आ रहा दशकों पुराना कानूनी और प्रशासनिक विवाद एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। जिला प्रशासन ने सोमवार को शहर की उस चर्चित प्लाईवुड फैक्ट्री परिसर को अपने कब्जे में ले लिया, जो कभी एशिया में अपने उत्पादों के निर्यात के लिए जानी जाती थी।
सरकारी कार्रवाई का 'ग्राउंड ज़ीरो'
पुलिस बल और प्रशासनिक अधिकारियों की टीम ने सोमवार को इस परिसर में प्रवेश किया। प्रशासन ने इस कार्रवाई को 'नजूल भूमि' को पुनः प्राप्त करने की प्रक्रिया बताया है। मौके पर मौजूद अधिकारियों ने पूरी कार्रवाई की वीडियोग्राफी करवाई और दस्तावेजों की विधिक जांच के बाद परिसर पर सरकार का अधिकार घोषित कर दिया।
क्या है यह विवाद?
यह औद्योगिक परिसर 1939 में एक ब्रिटिश नागरिक, हेनरी थॉमसन द्वारा स्थापित किया गया था। आजादी के बाद से ही इस बेशकीमती जमीन के मालिकाना हक को लेकर सवाल उठते रहे थे। 1987 में जब यह फैक्ट्री स्थायी रूप से बंद हुई, तो इसके स्वामित्व को लेकर कानपुर के कुछ निजी दावेदारों और स्थानीय प्रशासन के बीच कानूनी जंग शुरू हो गई। लगभग 150 बीघा में फैली यह जमीन पिछले 25 वर्षों से वीरान पड़ी थी, जो समय के साथ विवादों का केंद्र बन गई।
भू-माफियाओं और 'सफेदपोश' साठगांठ के आरोप
सूत्रों के अनुसार, इस प्राइम लोकेशन पर भू-माफियाओं की एक बड़ी घेराबंदी थी। स्थानीय स्तर पर ऐसी चर्चाएं काफी मुखर हैं कि इस जमीन पर अवैध प्लॉटिंग की तैयारी थी और कथित तौर पर करोड़ों रुपये का लेनदेन हुआ था। हालांकि, प्रशासन ने इन दावों की पुष्टि नहीं की है, लेकिन 'जीरो टॉलरेंस' नीति के तहत हुई इस कार्रवाई को माफियाओं के नेटवर्क पर एक बड़े प्रहार के रूप में देखा जा रहा है।
एक गौरवशाली इतिहास का अंत
कभी 1000 से अधिक कामगारों की जीविका का साधन रही यह फैक्ट्री सीतापुर की औद्योगिक पहचान थी। यहां तैयार होने वाले बोर्ड और प्लाईवुड का निर्यात नेपाल, भूटान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में होता था। समय की मार और कुप्रबंधन के चलते जो परिसर कभी रौनक से भरा था, वह धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो गया।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस खाली कराई गई बेशकीमती जमीन का उपयोग किस प्रकार करता है। फिलहाल, जिला प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि नजूल भूमि पर निजी दावों को सिरे से खारिज कर दिया गया है।
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