#सीतापुर:वट सावित्री व्रत: सीतापुर में महिलाओं ने अखंड सौभाग्य के लिए रखा उपवास, जानिए क्या है इस धार्मिक अनुष्ठान का महत्व

सीतापुर(उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद सहित देश भर में आज वट सावित्री व्रत का त्योहार पारंपरिक श्रद्धा और धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है। सुहागिन महिलाओं ने अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए सुबह से ही उपवास रखा है। जनपद के विभिन्न मंदिरों और चौराहों पर स्थित बरगद के वृक्षों के नीचे महिलाओं की भारी भीड़ देखी जा रही है, जहां वे विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर रही हैं और वट सावित्री की पौराणिक कथा सुन रही हैं। क्यों रखा जाता है वट सावित्री का व्रत?
सनातन धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए यह कठिन उपवास रखती हैं।
इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा का विधान है। हिंदू शास्त्र बताते हैं कि वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों का वास होता है। इसके साथ ही, इसकी लंबी आयु और गहरी जड़ें स्थायित्व का प्रतीक मानी जाती हैं, इसीलिए महिलाएं इस वृक्ष की परिक्रमा कर अपने वैवाहिक जीवन की मजबूती की प्रार्थना करती हैं।
सीतापुर के मंदिरों में उमड़ी सुहागिनों की भीड़
जनपद सीतापुर में आज सुबह से ही उत्सव का माहौल है। शहर के नैमिषारण्य तीर्थ क्षेत्र से लेकर ग्रामीण अंचलों तक, हर जगह महिलाएं पारंपरिक परिधानों और सोलह श्रृंगार में सजी-धनी नजर आ रही हैं।
स्थानीय धर्म शास्त्रियों के अनुसार, इस बार पूजा के लिए विशेष शुभ संयोग बन रहा है, जिसके चलते सुबह से ही बरगद के पेड़ों के नीचे महिलाओं की कतारें लग गईं। महिलाओं ने वृक्ष पर जल, कच्चा सूत, रोली, फूल और भीगे हुए चने अर्पित किए। इसके बाद वृक्ष के चारों ओर 7 या 108 बार परिक्रमा कर पति की लंबी उम्र की मन्नत मांगी।
 यमराज से पति के प्राण वापस लाने की पौराणिक कथा
वट सावित्री व्रत के केंद्र में सती सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा है। कथा के अनुसार, जब यमराज सावित्री के पति सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, तो सावित्री ने अपने पातिव्रत धर्म और बुद्धिमानी से यमराज को विवश कर दिया सावित्री के तर्कों और निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज ने न केवल सत्यवान के प्राण वापस किए, बल्कि उन्हें सौ पुत्रों का वरदान और खोया हुआ राजपाठ भी लौटा दिया। माना जाता है कि सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे ही अपने मृत पति को दोबारा जीवित पाया था, तभी से इस व्रत और कथा को सुनने की परंपरा चली आ रही है।

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