हमारी डाइनिंग टेबल पर लौटेगा अब ‘देसी ठाठ’… सुपरफूड्स की रेस में क्यों फेल हो गए ओट्स और कॉर्नफ्लेक्स?

✍️एक दौर था जब हमारे देश के गांवों और घरों में बुजुर्ग चाव से रागी, मक्का, कोदो, ज्वार और बाजरा खाते थे। उस दौर में लोग 80 साल की उम्र में भी बिना चश्मे और लाठी के खेतों और पगडंडियों पर दौड़ लगा लेते थे। लेकिन बदलते वक्त, आधुनिक चकाचौंध और पैकेट बंद खाने की संस्कृति ने इन पारंपरिक अनाजों को ‘गरीबों का खाना’ बताकर हमारी थाली से दूर कर दिया। उनकी जगह रिफाइंड गेहूं  और पॉलिश वाले सफेद चावल ने ले ली। नतीजा आज सबके सामने है घर-घर में डायबिटीज, बीपी, मोटापा, थायराइड और पेट की बीमारियां पैर पसार चुकी हैं।
लेकिन कहते हैं कि इतिहास खुद को दोहराता है। आज वक्त का पहिया घूम चुका है। जिसे हम पिछड़ापन समझकर छोड़ रहे थे, आज वही मोटा अनाज यानी सबसे बेहतरीन 'सुपरफूड' के रूप में हमारी थालियों में वापस लौट रहा है। सरकार से लेकर बड़े-बड़े डॉक्टर और वैज्ञानिक भी अब इसकी बात कर रहे हैं। आज अपने 'विशेष' कॉलम में जानिए कि क्यों आज की पीढ़ी अपनी मिट्टी के इस पारंपरिक अनाज की दीवानी हो रही है और क्यों यह आधुनिक जीवनशैली के लिए अमृत साबित हो रहा है।
 'ग्लूटेन-फ्री' का बढ़ता क्रेज और आंतों की सेहत का नया फॉर्मूला
आजकल हर बड़ा न्यूट्रिशनिस्ट और डॉक्टर पाचन को दुरुस्त रखने के लिए 'ग्लूटेन-फ्री'  डाइट की सलाह दे रहा है। दरअसल, आधुनिक गेहूं में पाया जाने वाला 'ग्लूटेन' नाम का प्रोटीन कई लोगों की आंतों में चिपक जाता है, जिससे पाचन तंत्र कमजोर होता है, पेट फूलता है और पुरानी कब्ज की शिकायत रहती है। दिनभर कुर्सी पर बैठकर काम करने वाले लोगों के लिए यह समस्या और बढ़ जाती है।इसके विपरीत, हमारे पारंपरिक मिलेट्स जैसे ज्वार, बाजरा, रागी और सावां प्राकृतिक रूप से 100% ग्लूटेन-फ्री होते हैं। यह हमारे पेट के लिए बेहद हल्के और पचाने में बहुत आसान होते हैं। यही कारण है कि जागरूक लोग अब सुबह के नाश्ते से प्रोसेस्ड कॉर्नफ्लेक्स या मैदे से बने ब्रेड को हटा रहे हैं और उनकी जगह रागी के चीले, ज्वार के उपमा और बाजरे के दलिए को अपना रहे हैं।
 डायबिटीज और मोटापे पर सीधा प्रहार: धीमी ऊर्जा का विज्ञान
आंकड़े बताते हैं कि आज हमारे समाज में 'टाइप-2 डायबिटीज' और बढ़ता वजन एक बहुत बड़ी समस्या बन चुका है। सफेद चावल, मैदा या गेहूं की अत्यधिक रिफाइंड रोटियां खाते ही शरीर में ग्लूकोज का स्तर अचानक तेजी से बढ़ता है, जिससे इंसुलिन का संतुलन बिगड़ जाता है और बार-बार भूख लगती है।
यहाँ पर हमारे मोटे अनाज बाजी मार लेते हैं। ज्वार और बाजरे जैसी चीजों का 'ग्लाइसेमिक इंडेक्स' बेहद कम होता है और इनमें 'कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट' पाया जाता है। इसका सीधा मतलब यह है कि जब आप मिलेट्स खाते हैं, तो यह पेट में बहुत धीरे-धीरे पचता है और शरीर को लंबे समय तक धीरे-धीरे ऊर्जा देता रहता है। इससे ब्लड शुगर अचानक नहीं बढ़ता। साथ ही, इसमें मौजूद भरपूर फाइबर पेट को साफ रखते हैं और वजन घटाने में चमत्कारी मदद करते हैं।
न्यूट्रिशन का पावरहाउस: दवाओं पर भारी पड़ता रागी का कैल्शियम
आधुनिक विज्ञान और फूड लैबोरेट्रीज की रिसर्च भी अब यह मान चुकी हैं कि हमारे देसी मिलेट्स पोषक तत्वों की चलती-फिरती खान हैं। आज की पीढ़ी हड्डियों की कमजोरी और जोड़ों के दर्द से बचने के लिए जो महंगी कैल्शियम और आयरन की गोलियां खाती है, उसका असली इलाज हमारी ही रसोई में सदियों से मौजूद था।
कैल्शियम के मामले में 'रागी' का कोई मुकाबला ही नहीं है। 100 ग्राम रागी में लगभग 344 मिलीग्राम प्राकृतिक कैल्शियम पाया जाता है, जो किसी भी अन्य अनाज या दूध की तुलना में बहुत अधिक है। यह बढ़ती उम्र के बुजुर्गों और बढ़ते बच्चों की हड्डियों को मजबूत बनाता है। इसी तरह, बाजरे में प्रचुर मात्रा में आयरन और जिंक होता है, जो शरीर में खून की कमी को प्राकृतिक रूप से ठीक करता है। सप्लीमेंट्स पर निर्भर रहने वाली नई पीढ़ी अब इन पारंपरिक फायदों को देखकर इन्हें अपना रही है।
 छोटा सा बदलाव
अपनी जड़ों की तरफ लौटना कभी भी पिछड़ापन नहीं होता, बल्कि यह अपने परिवार की सेहत को सुरक्षित रखने का सबसे समझदारी भरा फैसला है। अगर हम अपनी रोज की डाइट में कम से कम एक वक्त गेहूं की जगह मल्टीग्रेन या शुद्ध मिलेट्स शामिल कर लें, तो हम अपने परिवार को डॉक्टर की महंगी फीस और दवाओं के चक्रव्यूह से हमेशा के लिए बचा सकते हैं।

अस्वीकरण 
यह लेख केवल सामान्य जागरूकता और पाठकों की जानकारी के लिए प्रकाशित किया गया है। किसी भी गंभीर बीमारी स्थिति में या अपनी रोजमर्रा की डाइट में कोई बड़ा बदलाव करने से पहले हमेशा अपने डॉक्टर या योग्य आहार विशेषज्ञ से परामर्श जरूर लें।


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ