#सीतापुर: बढ़ते पारे के बीच 'सस्ती राहत' या सेहत से समझौता? जानें क्या कहता है लागत और शुद्धता का जमीनी गणित

सीतापुर(उत्तर प्रदेश): ज्येष्ठ के महीने में सूरज की तपिश और भीषण गर्मी से आम जनजीवन बेहाल है। इस तपती धूप और लू से राहत पाने के लिए राहगीर, कामगार और बच्चे बाजारों में मिलने वाले ठंडे पेय पदार्थों और खुले में बिकने वाले फलों का सहारा ले रहे हैं। गन्ने का रस, मैंगो शेक, लस्सी और फ्रूट चाट की दुकानों पर इन दिनों भारी भीड़ देखी जा रही है। लेकिन, इस बीच स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने वाले नागरिकों के लिए एक बड़ा और व्यावहारिक सवाल खड़ा होता है कि बाजार में मिलने वाली यह 'सस्ती राहत' वाकई हमारे शरीर के लिए कितनी अनुकूल है? आइए, बाजार के मौजूदा दामों के आधार पर लागत और शुद्धता के समीकरण को समझते हैं।
 ₹10 की ठंडी बोतलें और लागत का गणित
इन दिनों बाजारों और ग्रामीण अंचलों की दुकानों में मात्र ₹10 की कीमत वाली ठंडी बोतलों मैंगो ड्रिंक, जीरा सोडा या रंग-बिरंगे पेय पदार्थ की बाढ़ सी आ गई है। यदि व्यावहारिक रूप से देखा जाए, तो ₹10 की इस बोतल में पैकेजिंग की प्लास्टिक, ढक्कन, आकर्षक लेबल की ब्रांडिंग, फैक्ट्री का उत्पादन, लेबर का खर्च, ट्रांसपोर्टेशन और मुनाफा भी शामिल होता है। इन सारे खर्चों को घटाने के बाद बोतल के भीतर मौजूद पेय पदार्थ की वास्तविक लागत मात्र 2 या 3 रुपये ही बचती है। इतने कम दाम में प्राकृतिक फलों के रस की जगह केवल कृत्रिम मिठासऔर सिंथेटिक रंगों का ही मिश्रण संभव हो पाता है, जो लंबे समय में बच्चों के स्वास्थ्य के लिए अनुकूल नहीं माना जाता।
 महंगे फल-दूध बनाम सस्ते जूस और लस्सी
बाजार के मौजूदा भाव देखें तो इस समय अच्छी गुणवत्ता का आम ₹100 प्रति किलो, पपीता ₹100 किलो, केला ₹70 दर्जन और शुद्ध दूध ₹70 प्रति लीटर के आसपास बिक रहा है। एक गिलास गाढ़ा और शुद्ध मैंगो शेक या 200 ग्राम गाढ़ी लस्सी तैयार करने की मूल लागत ही काफी अधिक बैठती है, जिसमें बर्फ, चीनी और लेबर का खर्च अलग से जुड़ता है। इसके बावजूद चौराहों पर ₹20 से ₹25 में मैंगो शेक, लस्सी या 'मिक्स फ्रूट चाट' धड़ल्ले से बेची जा रही है। व्यावहारिक गणित कहता है कि इस कीमत पर ताजे फल या शुद्ध दूध देना किसी 
 के लिए व्यावहारिक नहीं है। दाम कम रखने के लिए अक्सर असली फलों के स्थान पर केवल फ्लेवर का उपयोग होता है या बहुत पहले से कटे हुए फल रखे होते हैं, जिन पर धूप, हवा और धूल का सीधा असर होता है।
 स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सरल और सुरक्षित सलाह
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि गर्मी के मौसम में शरीर को हाइड्रेटेड रखना बेहद जरूरी है, लेकिन इसके लिए बाजार के इन अत्यधिक सस्ते और अनियंत्रित विकल्पों पर निर्भर रहना सेहत के लिए ठीक नहीं है। ऐसे विकल्प शरीर को तुरंत ठंडक का अहसास तो करा सकते हैं, लेकिन लंबे समय में ये पाचन तंत्र और लीवर को प्रभावित करते हैं। चिकित्सकों की सलाह है कि धूप में निकलते समय हमेशा घर से पानी की बोतल साथ लेकर चलें। बाजार के विकल्पों के बजाय घर पर बने ताजे नींबू पानी, छाछ, मट्ठा, सत्तू या आम के पने को प्राथमिकता दें, जो पूरी तरह सुरक्षित हैं। यदि बाहर जूस या फल लेना भी पड़े, तो अपनी आंखों के सामने पूरी साफ-सफाई और ताजगी देखकर ही उसका चुनाव करें।

नोट: यह लेख बाजारों के मौजूदा सामान्य मूल्यों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा समय-समय पर दी जाने वाली आम सलाह पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी के व्यक्तिगत व्यवसाय को प्रभावित करना नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं को जागरूक करना है।


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