कॉर्पोरेट की 'क्लिक' में फंसी मरीजों की जिंदगी: बिना पर्चे की ऑनलाइन दवाएं दे रही हैं मौत को बुलावा, पारंपरिक केमिस्टों के वजूद पर संकट, 20 मई को बिसवां दवा दुकानें बंद.
बिसवां,सीतापुर (उत्तर प्रदेश):आधुनिकता के चश्मे से देखने वालों को भले ही घर बैठे मोबाइल पर एक 'क्लिक' से दवा मंगवाना बहुत आसान और सलीकेदार लगता हो, लेकिन इसके पीछे छिपी हकीकत बेहद खौफनाक और दर्दनाक है। 'ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट' के राष्ट्रव्यापी आह्वान पर आगामी 20 मई को बिस्वां कस्बे की तमाम दवा दुकानें पूरी तरह बंद रहने वाली हैं। यह बंदी सिर्फ एक व्यापारिक विरोध नहीं है, बल्कि यह देश की रीढ़ कहे जाने वाले छोटे व्यापारियों के वजूद की लड़ाई है और साथ ही आम जनता की सेहत के साथ हो रहे खिलवाड़ के खिलाफ एक शंखनाद है।
मोबाइल की स्क्रीन पर मौत का सौदा: बिना पर्चे के धड़ल्ले से बिक रही हैं दवाइयां
आज के इस तथाकथित डिजिटल युग में ऑनलाइन फार्मेसी और बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियां मुनाफे की अंधी दौड़ में अंधी हो चुकी हैं। नियमों और विधिक नियंत्रणों को ताक पर रखकर ये ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बिना किसी प्रामाणिक डॉक्टर के पर्चे के भी गंभीर और प्रतिबंधित दवाइयां लोगों के घरों तक पहुंचा रहे हैं। इसका सबसे घातक असर हमारी युवा पीढ़ी पर पड़ रहा है, जो बिना किसी चिकित्सीय परामर्श के डिप्रेशन, नींद और नशे की श्रेणी में आने वाली दवाओं का आसानी से शिकार हो रही है। यह महज व्यापार नहीं है, बल्कि देश के भविष्य की सेहत के साथ किया जा रहा एक खिलवाड़ है, जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
वो आधी रात का हमदर्द: जो मुनाफा नहीं, सिर्फ रिश्ता पहचानता है
अब थोड़ा ठहरकर उस मार्मिक पहलू पर गौर कीजिए, जिसे ये बड़ी कंपनियां कभी नहीं समझ सकतीं। जब आधी रात को घर में बच्चा तड़पता है या किसी बुजुर्ग की सांसें अटकती हैं, तब कोई मोबाइल ऐप या कॉर्पोरेट का डिलीवरी बॉय दवा लेकर नहीं आता। तब इसी बिस्वां कस्बे की गलियों में रहने वाला वो पारंपरिक दवा व्यापारी काम आता है, जो सिर्फ एक फोन कॉल पर अपनी दुकान का शटर उठा देता है। वो केमिस्ट सालों से पूरी ईमानदारी से सरकार को टैक्स दे रहा है, लेकिन आज कॉर्पोरेट की इस अनियंत्रित और अनैतिक प्रतियोगिता के कारण उसके सामने रोजी-रोटी का गहरा संकट खड़ा हो गया है। एक तरफ जहां वो स्थानीय दुकानदार है जो उधार पर भी दवा देकर आपकी जान बचाता है, तो दूसरी तरफ ये कंपनियां हैं जो बिना पैसों के एक गोली भी नहीं देतीं।
सख्त विधिक नियंत्रण की दरकार: सरकार कब चेतेगी?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल शासन और प्रशासन की मंशा पर उठता है। जब एक छोटे से स्थानीय मेडिकल स्टोर को खोलने के लिए तमाम कड़े विधिक नियमों, ड्रग लाइसेंस और कड़े निरीक्षणों से गुजरना पड़ता है, तो इन बड़े ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को इतनी खुली छूट क्यों? दवा कोई कपड़े या जूते नहीं हैं कि इनकी सेल लगा दी जाए। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के नियमों का इस तरह खुलेआम उल्लंघन समाज के लिए आत्मघाती है। दवा व्यापारियों की सरकार से यह बेहद जायज मांग है कि ऑनलाइन दवाओं की बिक्री पर तत्काल प्रभाव से एक बेहद सख्त विधिक फ्रेमवर्क लागू किया जाए। केवल पंजीकृत और पारंपरिक फार्मेसियों को ही इस विधा में पूरी जवाबदेही के साथ काम करने की अनुमति मिलनी चाहिए, ताकि स्थानीय रोजगार भी सुरक्षित रहे और आम नागरिकों की सुरक्षा भी बनी रहे।
इस बंदी के दौरान आपातकालीन और जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता के लिए दवा संगठन द्वारा आवश्यक मानवीय व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं।
डिस्क्लेमर-यह लेख जनहित और नागरिक स्वास्थ्य सुरक्षा को ध्यान में रखकर तैयार किया गया एक 'विशेष विधिक व पत्रकारिता विश्लेषण' है। इसका उद्देश्य किसी व्यवसाय, कंपनी या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की छवि धूमिल करना या मानहानि करना नहीं है, बल्कि देश के प्रचलित ड्रग्स कानूनों के क्रियान्वयन और स्थानीय रोजगार के संकट पर स्वस्थ चर्चा करना है।
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