सीतापुर(उत्तर प्रदेश):नेशनल हाईवे पर बहुगुड़ा चौराहा के समीप बना अंडरपास इन दिनों एक बेसहारा परिवार का ठिकाना बना हुआ है। चितरेता पुरवा का रहने वाला यह परिवार लंबे समय से सिर छुपाने की जगह न होने के कारण खुले आसमान और पुल के नीचे रातें काटने को विवश है। गाड़ियों के शोर और धूल-धूसरित माहौल के बीच 4 छोटे-छोटे मासूम बच्चों और पति-पत्नी का यह छह सदस्यीय परिवार जीवन और बुनियादी सुविधाओं के लिए कड़ा संघर्ष कर रहा है।
नेत्रहीन मां की बेबसी
परिवार की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि बच्चों की मां रूबी जन्म से ही पूरी तरह दृष्टिहीन है। आँखों में मुकम्मल अंधेरा होने के कारण इस खुले और असुरक्षित अंडरपास में अपने 4 बच्चों की देखभाल करना उनके लिए हर पल एक अग्निपरीक्षा जैसा है। बिना रोशनी की इस दुनिया में रूबी सिर्फ अपने बच्चों की आवाज और उनके अहसास के सहारे इस कठिन परिस्थिति में दिन काट रही हैं।
बीमारी में बिकी दो बीघा जमीन
रूबी ने रूंधे गले से अपने अतीत का दर्द बयां करते हुए बताया कि कभी गांव में उनके पास दो बीघा जमीन हुआ करती थी। लेकिन पति की गंभीर बीमारी के इलाज में वह जमीन भी हाथ से चली गई। रूबी का कहना है कि जब किस्मत ने इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया कि मांगकर ही पेट भरना है, तो कहीं भी रहो क्या फर्क पड़ता है। इसी लाचारी के चलते वे लोग गांव छोड़कर शहर आ गए, जहां अब जैसे-तैसे जिंदगी की गाड़ी कट रही है।
रिक्शा से पेट पालने की जद्दोजहद
इस विपरीत परिस्थिति में परिवार की आजीविका का एकमात्र सहारा पति दयाशंकर कटियार हैं। दयाशंकर दिन-भर सड़कों पर रिक्शा चलाकर हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं। इस कमरतोड़ महंगाई के दौर में रिक्शा की सीमित और अनिश्चित कमाई से ही वह अपनी दृष्टिहीन पत्नी और 4 बच्चों का पेट पाल रहे हैं। इस भीषण कड़े संघर्ष के बावजूद दंपती को समाज और प्रशासन पर पूरा भरोसा है कि देर-सवेर उन्हें और कोई न कोई मदद जरूर मिलेगी, जिससे उनके बच्चों का भविष्य संवर सकेगा।
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